A Punch From Super Man

♠ Posted by Vijay Singh Thakurai in
हाथो से नाग रस्सी निकाल के हवा में झूलता राज कॉमिक्स का "नागराज" और स्टार लाइन पर झूलता विलक्षण दिमाग का स्वामी "सुपर कमांडो ध्रुव" सभी को याद ही होगा
सुपर हीरोज की कल्पनाये हमारे बचपन का अभिन्न हिस्सा रही है.... नागराज,ध्रुव,भोकाल,साबू,बैटमैन,स्पाइडर मैन आदि की भीड़ में एक ऐसा चरित्र भी है जिससे ज्यादा वैश्विक पटल पर शायद ही कोई किरदार इतना फेमस रहा हो
.
"सुपर-मैन"
A Punch From Super Man

अर्थात क्रिप्टन गृह का निवासी... जिसकी पॉवर का कोई अंत नहीं... जो पलक झपकते ही ब्रह्माण्ड के एक कोने से दुसरे कोने में पहुच जाता है
जो अरबो खरबों किलो भार अपने एक हाथ से उठा सकता है
और तो और... जो समय की डाइमेंशन्स तक को मोड़ सकता है
तो भैय्या
क्या हो अगर.. ऐसा अफलातूनी जीव आपसे टक्कर लेने आ जाए???
क्या होगा... अगर आपके मुह पर सुपरमैन का घूँसा पड़ जाए?
.
Impossible... Right?
हीहीही
आप कहेगे की... "अबे तेरा दिमाग खराब है बे झकझकिये"
एक कॉमिक करैक्टर के घुसे के.... रियल लाइफ इम्पैक्ट की कैलकुलेशन कैसे हो सकती है?
.
Well... इतना मुश्किल नहीं है




1St come 1St 
कॉमिक्स में भले ही सुपरमैन पलक झपकते ही ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में पहुच जाए
पर... अगर कोई सुपरमैन वास्तविक रूप से इस ब्रह्माण्ड में संभव होता तो... एक चीज है... जिसे कर पाना सुपरमैन के लिए कभी सम्भव नहीं होता
"Superman can't travel at C....!!!
"SPEED OF LIGHT"

इन फैक्ट कोई भी चीज जिसमे द्रव्यमान हो... वो प्रकाश गति के समान गति कभी नहीं कर सकती
That's law...
तो फिर इस आधार पर... सुपरमैन की अधिकतम स्पीड कैलकुलेशन के लिए... प्रकाश गति (299792458 मीटर/सेकंड) की 99% अर्थात 296794533 मीटर/सेकंड मानी जा सकती है
और
आर्गुमेंट के लिए सुपरमैन की हथेली का एवरेज वजन स्वस्थ व्यक्ति के मानको पर मोटा मोटा 300 ग्राम माना जा सकता है
.
तो हमारे पास आंकड़े तैयार है
99% प्रकाश गति से 300 ग्राम का मुक्का आपके पास आ रहा है
और
Booooommmmmm !!!


Well... पहली बात तो... चूँकि प्रकाश के आपके रेटिना पर टकराने के बाद.. आपके ब्रेन द्वारा signols पढ़ के बताने में 13 मिली सेकंड (0.013 सेकंड) का वक़्त लगता है
और
इस घुसे की डिलीवरी में लगने वाला वक़्त बहुत कम होने के कारण (3.4 नैनो सेकंड)..... इस पंच की खुद से टक्कर.... देख ही नहीं सकेगे
You wont see that punch coming
.
पर भले ही आप सुपरमैन के पंच को देख ना पाए
पर आप इसे "महसूस" यानी फील जरुर करेगे
In fact... you will feel a lot..."HEAT"
.
सुपरमैन के पंच से लगभग 190,000,000,000,000,000 joules ऊर्जा उत्पन्न होगी.... जो की हिरोशिमा नागासाकी पर गिराए परमाणु बम से 2800 गुना ज्यादा ताकतवर परमाणु बम के बराबर होगी
इस विस्फोट का तापमान लगभग 80,000,000,000,000 केल्विन.... यानी हमारे सूर्य के केंद्र से भी 5000000 गुणा ज्यादा... हो जाएगा
इस विस्फोट से आपके शरीर के परमाणु तक विखंडित हो के बिग बैंग के तुरंत बाद बने "क्वार्क-ग्लुआन प्लाज्मा" में परिवर्तित हो जायेगे




इस पंच का असर सिर्फ आप पर नहीं... पूरी पृथ्वी पर पड़ेगा
99% प्रकाश गति से चलता 300 ग्राम द्रव्यमान वातावरण के कणों में भीषण घर्षण से आग लगा देगा... वातावरण के अणुओ में न्यूक्लियर फ्यूज़न शुरू हो जाएगा
हर तरफ आग के दावानल छा जायेगे
प्रचंड शॉक वेव्स धरातल पर बने किसी भी निर्माण को तोड़ डालेगी
समुद्र में कई सौ फुट ऊँची सुनामी आ जाएगी
और जीवन नष्ट हो जाएगा
.
और रह जाएगा तो... पृथ्वी पर एक किलोमीटर चौड़ा... और लगभग 221 मीटर गहरा
"Punch Mark Of Superman"
.
So funny enough...
अगली बार आपको सुपरमैन दिखे
तो... अपना रास्ता बदल देने में ही भलाई है
Its better not to piss Superman off...!!!
.
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नग्नता का अधिकार VS मर्यादा

♠ Posted by Vijay Singh Thakurai

कपडे... वस्त्र... clothes
कपडे पहनना हमारी पहचान है.. सर्दी गर्मी और बाह्य प्रतिकूल वातावरण से कपडे हमारी रक्षा करते है and clothes are also a sign of modesty
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पर सृष्टि में मनुष्य ही एकमात्र जीव है जिसने कपड़ो का कांसेप्ट विकसित किया है... ईश्वर ने हमें खुद को ढकने के लिए extra skin दे कर पैदा नहीं किया
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तो अगर मनुष्य ने समाज में कपड़ो का चलन प्रचलित किया है तो मनुष्य की ये भी जिम्मेदारी बनती है की इस चलन में सभी बराबर के हक़दार हो.. लिंग भेद के आधार पर कपड़ो के मामले में असमानता ना हो
.
ऐसा है क्या?
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सवेरे नल पे चड्डी पहन नहाते बुड्ढो बड़ो से लेकर ट्रैफिक के चौराहे पे लगे बड़े बड़े कट आउट में सिर्फ चड्डी पहन के अंग प्रदर्शन करते पुरुष मॉडल देखना आम बात है
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किसी शरीर सौष्ठव प्रतियोगिता के पहलवानों से ले कर हमारे इष्ट देवताओ तक का चित्रांकन तक आंशिक नग्न ही होता है
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गूगल पे "श्री राम" लिख के सर्च मारिये... क्या एक भी ऐसी फोटो मिलेगी जिसने श्री राम का सीना अनावर्त ना हो?
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पर पूनम पाण्डेय अगर एक टॉपलेस खिचवा ले तो?
संस्कृति के ठेकेदारों की भुजाये फड़क उठेगी




ऐसा दोहरा चरित्र क्यों?
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श्रीराम को,सलमान खान को, नुक्कड़ पे सवेरे सवेरे बाल्टी मग्गा लेके बैठे शर्मा जी को सीना दिखाने का अधिकार है?
पर पूनम पाण्डेय को नहीं...?
चड्डी बनियान पहने मोहल्ले में, घरो में मुक्त सांड की भाति विचरण करते लड़के दिख जायेगे
पर औरतो ने जीन्स पहन ली तो दिक्कत है?
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तो आज हम नग्नता की स्वतंत्रता पे बात करते है की नग्नता का अधिकार लिंग भेद के अनुसार परिवर्तित काहे होता है
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कुछ लोगो का तर्क है की ईश्वर ने नारी को कमजोर बनाया है और उसे खुद को ज्यादा ढक के रखने की जरुरत है क्युकी कामलोलुप निगाहें उसके अंगो का पीछा करती है... ऐसे लोगो की जमात के अनुसार स्त्री यौन अपराधो के पीछे स्त्री के अमर्यादित वस्त्र, उनका रात को घर से निकलना और बाजार द्वारा परोसी अश्लीलता ही जिम्मेदार होते है
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पर...
1. आचरण की नेतिकता का पैमाना कौन तय करेगा? क्या पुरुषो के लिए भी खुद को ढक के रखने का कानून लागू नहीं होता?
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2. अगर वस्त्र ही बलात्कार का एकमात्र कारण है तो वृद्धाओ, छोटी छोटी बच्चियों, कम उम्र के लडको और बुर्के में सर से पाँव तक ढकी औरतो का यौन शोषण होता? जाहिर है सिर्फ वस्त्रो को इसका जिम्मेदार ठहरा देना पुरुषवादी मानसिकता का प्रतीक है...
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3. "आँखों से बलात्कार करने में माहिर" चक्षु चोदन स्पेशलिस्ट लोग तो बुर्के के अन्दर भी औरतो के कटावो और उभारो का अंदाजा लगा लेते है..."माल खुले में पड़ा था" इसलिए चुरा लिया गया तो क्या चोर का अपराध कम हो जाता है? जीन्स देख निगाहे काम लोलुप हो जाती है तो दोष जीन्स का है या निगाहों का?
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4. औरते कमजोर है तो उनकी सुरक्षा की नेतिक जिम्मेदारी किसकी है?
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5. अगर बाजार भोग विलास परोस रहा है तो उस बाजार का खरीददार कौन है?
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भारतीय संस्कृति शुरू से ही समानता और स्त्री पुरुषो के लिए समान मुक्त यौनाचार के समर्थन में रही है
पर मध्य काल में जब धर्म का हास हुआ... स्त्रियों के शील पर दुष्ट लोगो के आघात होने लगे तो तत्कालीन समाज ने स्त्रियों की शारीरिक कमजोरी के मद्देनजर उनके लिए पुरुषो का संरक्षण अनिवार्य किया... जो शायद सही भी था क्युकी तब ना कोई कानून का डर था ना कोई मानवाधिकार आयोग..... जिसकी लाठी पे दम था उसकी ही भैंस हो जाती थी
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vijaysinghthakurai.com
पर ये तब की बात थी
आज हम 21vi सदी में है जहा संस्कृति परम्पराओ के ढकोसलो के ऊपर भारत का संविधान और कानून है जो सभी नागरिको को बिना लिंग भेद के समानता से जीने का अधिकार प्रदान करता है
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जीन्स पहनना, शराब पीना, सिगरेट पीना किसी का भी व्यक्तिगत अधिकार है... अगर कोई अपने व्यक्तिगत आचरण से आपकी हानि नहीं पहुचाता तो उसे नेतिकता की कसौटी पे धरती का बोझ घोषित कर देना न्यायसंगत है?
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अगर आपको क्लब में ठुमके लगाती लडकियो से दिक्कत है... सनी लियॉन से दिक्कत है... tv पे दिखाए जा रहे smooch से दिक्कत है तो क्या करेगे?
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टीवी फोड़ देगे?
धरना देगे?
जीन्स पहन के घूम रही लडकियो को थपडीयाना शुरू कर देगे?
मोर्चा निकालेगे?
जा अश्लीलता के विरोध में जंतर मंतर पे आत्मदाह कर लेगे?
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काहे जिन्दगी का लोड लेते है?
अपने बच्चो को टीवी पे "क्या देखना है और क्या नहीं" ये बताना ज्यादा आसान नहीं है?
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आपका अधिकार अपने बच्चो पे है ना की सनी लियॉन पे....
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जिस आदर्श समाज की आप कल्पना करते है उसे अपने घर में बनाइये... समाज अपने आप सुधर जाएगा
.
और....
रही बात लडकियों के अकेले घुमने की तो...
ठीक है मानते है की अपनी सुरक्षा अपने हाथ
पर
रात को 12 बजे निकलिए
मर्दों की पूरी फ़ौज रात भर कही ना कही अवश्य दिख जायेगी
और अगर दुनिया की आधी आबादी सिर्फ इसलिए रात को बाहर ना निकल पाए क्युकी... बाहर उसके शरीर की घात लगाए मानव भेड़िये घूम रहे है...???
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तो इस समाज को शर्म से डूब के मर जाना चाहिए
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औरतो को और जेब के माल को घर के अन्दर तिजोरी में रखने की सलाह देने वाले संस्कृति के ठेकेदार ये क्यों भूल जाते है की....
.
रामराज्य का अर्थ माल को तिजोरी में रखना नहीं...
.
रामराज्य तो तब कहलायेगा.....
.......जब किसी भी घर में तिजोरी की जरुरत ही ना हो
नोट:
1. इस पोस्ट में राय तभी दे जब आपकी मर्यादा का पैमाना स्त्री पुरुषो के लिए समान हो
2. इस पोस्ट पे संस्कृति के नाम पे विधवा प्रलाप करने वालो की भावनाए मैं गंभीर रूप से आहत करने की गारंटी देता हूँ

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The Ultimate Cosmic Deletion Of Universe: क्या आप कुछ भी डिलीट कर सकते है?

♠ Posted by Vijay Singh Thakurai in ,
The Ultimate Cosmic Deletion Of Universe: क्या आप कुछ भी डिलीट कर सकते है?

सन 1924:
सोवियत रूस में "लेनिन" की मृत्यु के बाद कम्युनिस्ट नेता "स्टालिन" को जब अपने साथी और सोवियत युद्ध विशेषज्ञ "ट्रोट्स्की" से ख़तरा महसूस होने लगा... तो ट्रोट्स्की को देश का दुश्मन करार दे के तड़ीपार कर देने के साथ एक ऐसा काम भी हुआ.... जो विश्व इतिहास में अदभुत था
Trotski..... was deleted... from Soviet history
Seriously.... सभी फोटो अथवा डाक्यूमेंट्स... जिनमे ट्रोट्स्की मौजूद था.... एडिट कर दिए गए
सरकारी रिकॉर्ड की सभी फोटो में से... ट्रोट्स्की को डिलीट कर दिया गया
.
आज कई कैमरा एडिटिंग सॉफ्टवेयर आपको अपनी फोटो से एडिटिंग एंड अनचाहे कंटेंट डिलीट कर देने की सुविधा देते है
पर... मैं आज ये पूछना चाहता हूँ
कि... How does a computer.... forgets???
.
आज सवेरे अपने कंप्यूटर में पिछले दिनों लूमड के साथ बिठाये पलो की फोटो देखते वक़्त.. एक फोटो में मुझे लगा की लूमड का चेहरा हमसे ज्यादा शाइन मार रिया है
हीहीही
तो काम्प्लेक्स फीलिंग के तहत.. मैंने वो फोटो डिलीट कर दी
तो... वो फोटो डिलीट हो गई?
नहीं...
फोटो "रीसायकल बिन" में अभी भी मौजूद है
खैर... हमने रीसायकल बिन खोल के... फोटो वहा से भी... डिलीट कर दिया
तो अब?
फोटो डिलीट हो गया?
.
हम्म... Short answer is
.....NO.....




इन फैक्ट... किसी भी कम्प्यूटर.. या लैपटॉप या फोन में ऐसी कोई तरकीब ही नहीं है
जिससे... आप कुछ भी डिलीट कर पाए
फोटो... अभी भी कम्प्यूटर में ही है
और.. Special Data Recovery Tools से... वापस प्राप्त की जा सकती है
.
वास्तव में जब आप कुछ डिलीट करते है.. तो कम्प्यूटर उस फाइल को डिलीट नहीं करता
It just mark it.... "Space Available To Rewrite"
.
फाइल को नष्ट करने के लिए आप सिर्फ उस फाइल के स्पेस को rewrite कर सकते है
2-5-10 बार rewrite करने पर भी डाटा पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता
इन फैक्ट... even 35 rewrites... "are not enough"
.
विकसित देश अक्सर "डोनेशन" के तौर पर अपने इलेक्ट्रॉनिक आइटम वेस्टेज... विश्व इलेक्ट्रॉनिक डंपिंग ग्राउंड के नाम से मशहूर "घाना" नामक देश में भेजते रहे हैं
पूर्व में वहा कुछ घटनाओं में.. संगठित माफिया के गिरोह इन कबाड़ इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स जैसे लैपटॉप कम्प्यूटर आदि की मेमोरी में एक्सेस कर... special data recovery tools से... विभिन्न देशो के गुप्त रक्षा और सैन्य दस्तावेज चुराने में सफल रहे है
.
देखा जाए तो... "कागज़ के टुकड़े टुकड़े कर देना भी" खतरे से खाली नहीं है
पूर्व में कुछ ईरानियन छात्रो को ईरान में गिरफ्तार कर लिया गया था...
क्युकी वे... अमेरिकन एम्बेसी के आगे अमेरिकन कर्मचारियों के द्वारा फेके गुप्त दस्तावेजो के कागज के टुकड़े चुरा के... स्पेशल स्कैनर की सहायता से "जिग्सा पजल" की तरह... उन कागजो को Rearrange करने में सफल हो गए थे



If you want to delete something???
Destroy it..... Trash it badly
Time is on your side!!!
.
4-5 अरब सालो में.... हमारा अपना "सूर्य" एक जोरदार विस्फोट के साथ एक विशालकाय आग के गोले में तब्दील हो जाएगा.... जो की ultimate shredder बन के इस पृथ्वी पर मौजूद सभी मेमोरीज... डाटा के साथ इस पृथ्वी को ही खा कर... सौर मंडल से परमानेंट डिलीट कर देगा
But... Who knows
शायद हम इन्सान तब तक इतने स्मार्ट हो चुके हो... की आने वाले वक़्त को भांप के... हम किसी और गृह पर बोरिया बिस्तर लेके रहने निकल चुके है
.
पर इन्सान भले ही कितना भी स्मार्ट भले ही हो जाए
एक वक़्त ऐसा जरुर आएगा
जब...... इन्सान को ब्रह्माण्ड का स्याह हिस्सा यानी Ultimate Cosmic Deletion का सामना करेगा
किसी अज्ञात रहस्यमयी शक्ति "डार्क एनर्जी" के कारण ये ब्रह्माण्ड आश्चर्यजनक रूप से फैलता जा रहा है
सभी तारे... आकाश गंगा...प्रकाश गति से भी तेज एक दुसरे से दूर भाग रहे है
अगर ऐसा ही चलता रहा तो... 20-22 अरब वर्ष के अन्दर... इस ब्रह्माण्ड में मौजूद हर सभ्यता अपने "अंत" का दीदार करेगी
.
ये डार्क एनर्जी ब्रह्माण्ड का विस्तार तब तक करती रहेगी... जब तक इस ब्रह्माण्ड का कण कण विखंडित ना हो जाए... और अंत में ये डार्क एनर्जी ब्रह्माण्ड को फाड़ डालेगी
अनगिनत तारो... ब्लैक होल... ग्रहों से चमकता दमकता ये खुबसूरत ब्रह्माण्ड... अंत में कागज के फाड़ के फेंक दिए टुकडो समान... कण कण में विखंडित हो जाएगा
ये ब्रह्माण्ड के अंत की एक संभावनाओं में से एक है
!....The Big Rip....!
शायद तब हम इन्सान... हमारी मेमोरीज... हर डाटा.... इस ब्रह्माण्ड के साथ हमेशा के लिए... डिलीट हो जाएगा
.
We humans... went to moon
17 दिसम्बर 1903 को हवा में प्रथम बार परवाज करने के.... 66 साल के अन्दर... within a life time....... हम इन्सान चाँद पर पहुच गए थे
चाँद पर पहला इंसानी कदम रखने वाले "नील आर्मस्ट्रांग" ने चाँद पर मानवता की फतह के तौर पर... अमेरिकी झंडा चाँद पर छोड़ दिया था
झंडा... आज भी वही है
पर... झंडे के रंग और सिम्बल्स... घातक सोलर रेडिएशन के कारण गायब हो गए है
तो क्या... Flag is deleted? or
May be...
Its like a fresh paper
Waiting for new stories
To be written......!!!!




क्या पता... प्रकृति भी शायद... समय समय पर... पुरानी कहानिया डिलीट कर... नयी कहानियो की इबारत लिखती हो
.
अगर इस ब्रह्माण्ड की क्रिटिकल डेंसिटी 1 से कम हैं तो... ये ब्रह्माण्ड हमेशा के लिए डिलीट हो जाएगा
पर
अगर ब्रह्माण्ड की क्रिटिकल डेंसिटी... 1 से ज्यादा है
तो
एक ना एक दिन.... ये ब्रह्माण्ड सिकुड़ना शुरू कर देगा... और सम्पूर्ण पदार्थ एक जगह "सिंगुलारिटी" पर एकत्र हो के
फिर से एक विस्फोट के साथ... एक नए ब्रह्माण्ड को जन्म देगा
.
और फिर से... हम इन्सान.. नयी कहानियो की नयी इबारते... लिख पायेगे
.
सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है
.
पर अगर ऐसा होता है
तो शायद... जिसे हमें विध्वंस समझते है
वो क्या एक नए निर्माण की शुरुआत नहीं?
.
Point is... what I am getting at
.
What we think deletion.... could be also
"RECREATION"
****************
And As Always
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A War Against Cancer

♠ Posted by Vijay Singh Thakurai in
A War Against Cancer

जिस पल आपकी नजर इस पोस्ट पे पड़ी है...और आपने इसे पढना शुरू किया... तब से अब तक...
"आपके शरीर की लाखो कोशिकाए... मर चुकी है"
.
बल्कि देखा जाए तो आप "मृत्यु" से घिरे हुए है
.
अबे अबे...
कलयुगी चचा.. आपका बोदी काहे मारे रोमांच के खड़ा हो गया
हीहीही
.
मृत्यु मतलब मृत चीजे...
आपके नाखून...बाल... खाल की बाहरी परत सब कुछ मृत है.. और आप इन "मृत चीजो" को लगातार खोते और रीसायकल करते रहते है
....एक हफ्ते में लगभग 5.5 ग्राम तक मृत खाल आपके शरीर से स्वयं अलग हो जाती है... ohio यूनिवर्सिटी के शोध के मुताबिक घर के अन्दर किसी खिड़की से छन के आती सूरज की रौशनी में जो "तैरते हुए" तंतु नुमा चीजे आप देखते है उसमे 80% तक आपकी खुद की खाल के अवशेष होते है
.
पर चिंता की कोई बात नहीं... ये सब शरीर की सामान्य प्रक्रियाए है.. इन मृत चीजो को छोड़ दिया जाए तो आपका शरीर सजीव चीजो से बना है





आप मैं और कोई इन्सान एक चलती फिरती बायोलोजिकल भट्टी के समान है.. भट्टी जिसमे रोज ईधन यानी भोजन डाला जाता है और उसके सहारे हम सांस लेते चलते फिरते और जीते है
.
पर भले ही आप कुर्सी पे बैठे हो या अपने पलंग पे लंबलेट होके इस पोस्ट को पढ़ रहे है...
"आपकी कोशिकाए यानी की body cells जिससे आपका शरीर बना है... वे कभी नहीं आराम करती"
.
आपकी कोशिकाए हमेशा व्यस्त होती है.. हर मिनट लाखो कोशिकाए स्वयं से दूसरी कोशिकाओ को जन्म देती है.. यानी एक से दो होती है.. दो से चार और चार से आठ और सिलसिला चलता रहता है... पुरानी कोशिकाए मरती जाती है.. नयी जन्म लेती है.. और ये सिलसिला आपके इस दुनिया में टपकने से लेके आज तक बदस्तूर जारी है
.
पर आज जो हम बात करने वाले है वो इन्ही कोशिकाओ के सम्बन्ध में है...
जब एक कोशिका स्वयं से दूसरी कोशिका को जन्म देती है अर्थात प्रतिलिपि तैयार करती है... तब daughter cell यानी पैदा होने वाली कोशिका को प्रथम कोशिका से प्राप्त डीएनए के exact sequence को कॉपी करने के लिए... 3 अरब न्यूक्लीयोटाइड्स को कॉपी करना पड़ता है
.
3 अरब?
wow... भाग्य से हमारी कोशिकाए perfectly इस काम को करती है
But.... sometimes our cells are not "perfect"






हर बार जब आपकी कोशिका एक दूसरी कोशिका को जन्म देते हुए उन एन्जाइम्स को बांटती है जो आपके डीएनए को सिंथेसाइज करते है... तब.... आपकी कोशिका... 120000 गलतिया करती है
.
120000 mistakes....
.
इन गलतियों में कुछ गलतिया ऐसी होती है... जो आपके लिए अच्छी होती है
और कुछ गलतिया... कभी कभी बहुत भारी पड़ जाती है
.
भाग्यवश आपका शरीर भी आपके pc की तरह auto correct सिस्टम का पालन करता है और इन गलतियों को नुकसान पहुचाने देने से पहले ही विसंगत कोशिका को "आत्महत्या" का आर्डर मिल चुका होता है
पर...
अगर किसी सेल के डीएनए में बदलाव से सेल एब्नार्मल व्यवहार करे... और कई बार "चूकवश" सिग्नल्स रुकने से आत्महत्या के आर्डर का पालन ना करे.. खुद को द्विगुणित करती रहे तो....ये एक स्पेशल सेल्स का समूह बन जाता है... जिसे हम सामान्य व्यवहार में कहते है
●कैंसर●
.
अब तक लगभग 200 प्रकार के रोगों को चिन्हित किया जा चुका है जिन्हें कैंसर की श्रेणी में रखा जा सकता है
बावजूद इसके की जन्म के साथ ही पूरे जीवन आप अपने शरीर के auto correct सिस्टम में त्रुटी या भूल चूक के कारण जीवन के प्रत्येक क्षण "क्षणिक" कैंसर को उत्पन्न करते है और उससे निजात पाते है... पर्यावरण और दुसरे बाह्य कारणों के कारण भी कैंसर हो सकता है जैसे की सूर्य के रेडिएशन का एक्सपोज़र... तम्बाकू शराब वगेरह वगेरह
.
यहाँ जो चीज मेरा दिमाग खराब करती है वो ये है की जब जन्म के साथ से ही प्रत्येक क्षण हम से हर किसी के सर पे कैंसर की तलवार लटक रही है तो हम सभी को कैंसर क्यों नहीं होता?
Sure... हमारे शरीर का ऑटो करेक्ट सिस्टम लाजवाब है पर अक्सर ये सिस्टम ज्यादातर केस में 55 के बाद ही फ़ैल क्यों होने लगता है?
शायद इस पहेली को प्रकृति के प्राक्रतिक चयन अर्थात natural selection phenomena से समझा जा सकता है






मनुष्य के evolution में प्रकृति हमेशा सृष्टि की वृद्धि के लिए हमेशा जीवो का साथ देती रही है.. हम मनुष्य बुद्धिमान प्रजाति के है.. हमारे बच्चे इस दुनिया में मौजूद दूसरी प्रजातियों से उत्कृष्ट दिमाग रखते है.. हम मनुष्य ही एकमात्र जीव है जो सजीव होने के साथ साथ "चेतन" है.. और इंसानी दिमाग का साइज़ इन्सान के शरीर के अनुपात पे "बहुत बड़ा" होने के कारण हमारे बच्चो को समय चाहिए होता है..
खुद को संभालने के लिए..
खुद को जिन्दगी की दौड़ में भागने के लिए तैयार करने में
और प्रकृति हमारा साथ देती है.. पर जब हमारा रोल इस दुनिया में घटता जाता है... प्रकृति निष्ठुर होती जाती है... और survival of the fittest के सिद्धांत के आधार पे हमें मरने के लिए तैयार होना पड़ता है... ताकि हमसे आगे वाले जी पाए
.
पर... हम इन्सान भी कम चालाक नहीं..
हम मौत बांटने वाले जहर सिगरेट शराब बनाते है
उन्हें बेचते है...
और... इस जहर से जान बूझ के मौत खरीदने वालो को हम... मरने के लिए नहीं छोड़ देते
उनके लिए कुदरत से लड़ते है






हम रोज कुछ नया सीखते है... प्रक्रिया धीमी है क्युकी कैंसर कोई एक सिंगल चीज नहीं जिसका कोई रामबाण हो... पर हम बेहतर इलाज की खोज करते है.. इंसानियत के बेहतरी के लिए अपनों को ज़िंदा रखने के लिए कुदरत से लड़ते रहते है
और इन्सान कुदरत से इस जंग में.. पूरी टक्कर दे रहा है क्युकी आंकड़ो के मुताबिक 40 साल पहले तक diagnosis के बाद सिर्फ चार में एक इन्सान 10 या ज्यादा साल जी पाता था
आज ये आंकड़ा चार में से दो का है
और
सिर्फ 20 सालो में ये आंकडा चार में से तीन का हो चुका होगा
.
हम इन्सान कैंपेन चलाते है
नयी खोजे करते है
4 फ़रवरी को वर्ल्ड कैंसर डे मनाते है
कुदरत से जंग जारी है... और हमेशा चलती रहेगी
.
बेशक हम सब एक समुन्दर में जिन्दगी की नाव में सवार है... वो नाव जिसे एक ना एक दिन डूबना ही है
पर एक वक़्त शायद वो भी आये.. जब हम... इन्सान ये फैसला ले पाए की उन नावो को कब डूबना है
OUR DECISION !!!
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Do Scientists Believe In God - क्या वैज्ञानिक धार्मिक होते हैं?

आज से लगभग 2300 साल पहले हुए आधुनिक एस्ट्रो साइंस (Also Nearly All Pseudoscience) के जनक महान वैज्ञानिक "टॉलेमी" ने एक बार कहां था
.
जब भी मैं आसमान में विचरते हुए इन देवलोको को देखता हूँ... मेरे कदम पृथ्वी से स्वयं ऊपर उठ जाते है और मुझे एहसास होता है कि मैं साक्षात "ज्यूस" (ग्रीक ईश्वर) की छाया में उनके अलौकिक प्रकाश में नहा कर अमृतपान कर रहा हूँ !!!
.
Well... टॉलेमी ने चट्टानों, झरने, नदियो को देख कर कभी भी ईश्वर को याद नही किया... पर ब्रह्माण्ड के इन स्याह अंधेरो के परे जहाँ टॉलेमी के तर्क और ज्ञान की सीमा उसे समाप्त होते हुई दिखी... वहां उसके पास आसमान में विचरते हुए पिंडो के लिए एक ही कारण शेष रह जाता था !!!

God !!!



सर आइजक न्यूटन... जिन्हें विश्व का प्रथम वैज्ञानिक कहा जाता है... खुद एक धार्मिक इंसान थे
ग्रहो की गति की सफलतम व्याख्या करने वाले, प्रकाश के नियमो को प्रतिपादित करने वाले, गुरुत्व की गणितीय समीकरणों को प्रतिपादित करने वाले न्यूटन ने... अपनी जिंदगी का अधिकतर हिस्सा धर्म ग्रंथो की खोज पड़ताल कर... "बाइबिल से प्रलय की तारीख खोज निकालने" अथवा पारे को सोने में कन्वर्ट करने जैसी वाहियात चीजो में नष्ट कर दिया !!!

न्यूटन दुनिया को गणितीय रूप में ये समझाने वाले पहले व्यक्ति थे कि ग्रह सूर्य के चारो ओर किस बल से अपनी कक्षा में टिके रहते हैं और कैसे गति करते है
पर "stellar evolution" से अपरिचित न्यूटन के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि... ये ग्रह अपनी कक्षा में आये कैसे?
तो न्यूटन के पास भी इस बात का एक ही जवाब था
And After God Set Planets In Motion !!!

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The Problem With Omnipotent God

अक्सर धार्मिकों द्वारा ज्यादातर वैज्ञानिको के "आस्तिक" होने के तथ्य को उठाकर धर्मग्रंथो को जस्टिफाई करने की बचकाना कोशिश होती रही है
विश्व के इतिहास पर नजर दौड़ने पर ये स्पष्ट रूप से समझ आता है कि... तत्काल विश्व के महान मस्तिष्क अंधविश्वासों से मुक्त नही थे

और ब्रह्माण्ड को समझने की कोशिश करते वक़्त जिस बिंदु पर उनके ज्ञान की सीमा का अंत हो जाता था
उस बिंदु के पार मौजूद अज्ञात को... ईश्वरिय सत्ता घोषित कर देने के अलावा उनके पास कोई विकल्प शेष नही रह जाता था
ये वो वक़्त था... जब आग जलाने, हवा चलाने, पेड़ उगाने, ग्रहो को अपनी कक्षा में घुमाने आदि प्रकृति की हर क्रिया को संपन्न कराने के लिए...एक देवदूत हमेशा ड्यूटी में तत्पर रहता था
समय के साथ... हर बीतती खोज और वैज्ञानिक नियमो के साथ... हम अपनी नौकरी में तत्पर देवदूतों को छुट्टी पर भेजते रहे हैं।
लेकिन...

We Are Not There Yet

बहुत कुछ है... जो जानना बाकी है
अज्ञात का साम्राज्य अभी भी बहुत बड़ा है !!!
और जब तक अज्ञात है... तब तक आस्तिकता का भी वजूद कायम रहेगा 




सवाल यहाँ आस्तिक होने अथवा होने का नही है
किसी साफ़ रात में अपने सर के ऊपर जगमगाते इन अरबो सूर्यो, अंतरिक्ष में तैरते इन खरबो चट्टान के टुकड़ो, ब्लैक होल्स, सुपर नोवा आदि को देखिये...

क्या ऐसा कोई होगा... जो ब्रह्माण्ड की अनंतता पर मुग्ध अथवा विस्मित हुए बिना रह जाए?
ब्रह्माण्ड की इस विशाल सत्ता को देख... मन स्वयं ही इस ब्रह्माण्ड के निर्माता पर मनन के लिए विवश हो जाता है !!
.
लेकिन... वैज्ञानिको का ईश्वर यानी इस कायनात को बनाने वाला खुदा... धर्मग्रंथो या मजहबी किताबो में वर्णित ईश्वर नही है।
ये वो ईश्वर नही... जो सत्यनारायण की कथा से प्रसन्न होकर आपको स्वर्ग पहुचाने की गारंटी देता हो
ये वो खुदा नही... जो अपने ही बनाये इंसान को मारने पे आपको जन्नत नवाजने का वादा करता हो
और ये वो ईश्वर भी नही... 
जिसने हम इंसानो को इस धरती पर मजहब के नाम पर एक दूसरे का खून बहाने के लिए भेज दिया क्योंकि...
क्योंकि... उसे अपनी रियासत में एक औरत का सेब खाना पसंद नहीं आया
.
धार्मिक होना या अपनी किताबो को मानना कोई गलत नही है.. पर समस्या तब उत्पन्न होती है जब.. आप अपनी किताबो को विश्व की प्रथम और अंतिम ईश्वरीय आदेश घोषित कर देते है
Trust me... अगर किसी भी धार्मिक किताब में कोई भी गूढ़ ज्ञान छुपा होता तो वैज्ञानिक रोज ब्रह्माण्ड को समझने के लिए धार्मिक किताबो की खुदाई कर रहे होते




उदाहरण के लिए.. क्या कोई भी धार्मिक किताब ऐसी है... जिसमे ये बताया हो कि... "सूर्य और चन्द्रमा" क्या हैं?
क्या किसी में भी एक छोटा सा भी हिंट है कि सूर्य एक न्यूक्लिअर फ्यूजन से दहकता हुआ गोला अथवा चद्रमा एक बेजान चट्टान का टुकड़ा हो सकता है?
नहीं... हर धर्म ग्रन्थ में आपको सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति शनि आदि सभी आकाशीय पिंड मानवीय रूप में पृथ्वी पर युद्ध लड़ते, शादी ब्याह रचाते, छल, लोभ, अहंकार आदि से घिरी हुई कथाओ के नायको के रूप में मिलेगे

This Is What You Want To Believe ?

जाहिर सी बात है कि मानव की विकास यात्रा जिसमे मानवो ने आकाशीय पिंडो के ऊपर स्वयं का नामकरण किया था... उस यात्रा को दिव्य चोला पहनाने में कहीं ना कहीं हमसे गलती हुई है
.
क्या किसी भी धर्मग्रन्थ में रात के आसमान में नंगी आँखों से दिखाई देने वाले 5 पिंडो के अलावा किसी ग्रह का जिक्र है?
हमारे आसमान में सूर्य, चंद्रमा की तुलना में बड़ा दिखाई देता है... और चूँकि स्वाभाविक है कि "बड़ी दिख रही चीज हमसे नजदीक होनी चाहिए" लेकिन चूँकि सूर्य चन्द्र की तुलना में करोडो गुणा बड़ा है इसलिए दूर स्थित होने के बावजूद सूर्य चाँद से बड़ा दिखता है..
क्या किसी भी धर्म ग्रन्थ में ये बताया गया है कि सूर्य... चाँद की बनिस्पत हमसे ज्यादा दूर है?
.
बच्चे बच्चे को ज्ञात ये कुछ सामान्य बाते जिन धर्मग्रंथो को ज्ञात नही है... उन ग्रंथो को अंतिम ईश्वरीय शब्द कैसे समझा जा सकता है?
मैं ये नही कहता कि धर्मग्रन्थ पूर्ण रूपेण कचरा है... या धर्मग्रंथो ने मानव विकास में कोई योगदान नही दिया है
ऑफकोर्स ये ग्रन्थ ही मानव के इतिहास के एकमात्र उपलब्ध दस्तावेज है... इनका अध्ययन मानवीय दृष्टिकोण से ही किया जाना चाहिए




धर्म और विज्ञान.. दोनों का उद्देश्य समान अर्थात "सत्य की खोज" है
पर धर्म और विज्ञान में मुख्य अंतर अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए चुना गया "मार्ग" है
जहाँ विज्ञान आपको "जानो और मानो" की राह पे चलने को कहता है
वहीं धर्म आपको तथ्यहीन श्रद्धा के मार्ग पर चलाना चाहता है
और बिना कारण... बिना तथ्य... किसी अज्ञात के प्रति दासता का अंगीकार भी... ईश्वर द्वारा प्रदत्त विवेकशील बुद्धि का गंभीर अपमान है !!!
.
शायद ईश्वर का अस्तित्व हो
हो सकता है...आपकी अंतिम नियति स्वर्ग का साम्राज्य प्राप्त करना हो
शायद धर्मग्रन्थ आपको स्वर्ग तक पहुचाने की गारन्टी भी देते हो
Religion Might Tell You How To Go To The Heavens 
But... To Know... "How" The Heavens Go?
Study Science !!!
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Things Not Allowed To Do In Space

♠ Posted by Vijay Singh Thakurai in ,
1998 में लॉन्च और 18 सालो से लगातार पृथ्वी के चक्कर लगा रहा 73 मीटर लंबा और 108 मीटर चौड़ा विशालकाय सॅटॅलाइट "इंटरनेशनल स्पेस सेंटर"... पृथ्वी के अलावा एक मात्र ऐसी जगह है.. जहाँ इंसान रहते और काम करते हैं !!!
चूँकि हर कार्यालय के कुछ रूल्स और रेगुलेशन होते है... जो हमें मानते पड़ते हैं। 
कई ऐसी चीजे है... जो आप पृथ्वी पर ख़ुशी ख़ुशी कर सकते हैं लेकिन... जमीन के 400 km ऊपर स्पेस में...?
You Must Follow Certain Rules !!




Here Are 4 Things..You R Not Allowed To Do In Space !!!
.
1: NO SEX !!
पहली बात.. चूँकि ISS एक वर्कप्लेस है इसलिए वहां यौन सम्बन्ध बनाना नासा के अनुसार "नैतिकतापूर्ण" नही है...
दूसरी बात...स्पेस के माइक्रो ग्रेविटी तथा घातक रेडिएशन से भरे माहौल में प्रेगनेंसी का रिस्क नही उठाया जा सकता। ये विषम परिस्थितिया एक भ्रूण के लिए जानलेवा हो सकती है।
और अगर कोई महिला प्रेग्नेंट हो भी जाती है तो पृथ्वी पर लौटते समय की यात्रा में... वातावरण में Re-Entry के दौरान स्पेस शिप्स में होने वाला अनुभव बहुत झटकेदार होता है... इस यात्रा में अंतरिक्ष को अपने शरीर पर कई टन के वजन के प्रेशर का अनुभव होता है.. जिस प्रेशर को झेलने के लिए अस्ट्रॉनॉट्स को स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है
लेकिन ये प्रेशर एक नवजात भ्रूण के लिए जानलेवा हो सकता है और Ultimately माँ के जीवन के लिए भी ख़तरा पैदा हो सकता है। 

इसलिए.. ISS पर नासा द्वारा अस्ट्रॉनॉट्स को "नो सेक्स" रूल का पालन करने को कहा जाता है। 
अफवाहे उड़ती है कि...एस्ट्रोनॉट्स शायद छुप कर सेक्स करते हो
लेकिन... ISS का 388 वर्ग मीटर का एरिया मुझे व्यक्तिगत तौर पर इतना पर्याप्त नही लगता कि... 6 लोगो की निगाह से छुप कर सेक्स किया जा सके
(No Comments On Masturbation)




2: NO ALCOHOL
नशे में किसी अस्ट्रॉनॉट द्वारा की गई एक गलती सम्पूर्ण स्पेस शिप को ध्वस्त कर सकती है... इसलिए स्पेस शिप पर शराब पीने की आज्ञा नासा द्वारा नही है
पर रशियन्स शायद इस रूल को नही मानते... कई रशियन्स अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा स्पेस में शराब पीने की हामी भरी गई है।
1970 तक नासा भी शराबबन्दी के लिए गंभीर नही थी
इन फैक्ट 1970 के दशक में... "लंबी स्पेस यात्राओ की तैयारी के दौर" में... नासा द्वारा अंतरिक्ष यात्रियों के लिए तैयार किये मेनू कार्ड में "शेरी" वाइन भी थी
लेकिन अमेरिका की आम जनता को "अंतरिक्ष यात्रियों को शराव परोसने" की खबर मिलने पर हजारो की संख्या में लोगो ने नासा को पत्र भेज कर अपना विरोध दर्ज कराया !!!
जिसके बाद नासा ने "अल्कोहल फ्री स्पेस" पालिसी अपना ली
शायद अल्कोहल को बैन करने की ये एकलौती वजह नही थी
रिपोर्ट्स कहती है कि.. चूँकि माइक्रो ग्रेविटी में भोजन आपके पेट में तैरता रहता है... शराब के साथ इसका मिश्रण भयंकर डकारों के साथ वोमिटिंग का सबब बन सकता है। पृथ्वी पर "आर्टिफीसियल जीरो ग्रेविटी" वातावरण में किये गए प्रयोगों में इसकी पुष्टि हुई है
वोमिट से निकले कण संवेदनशील मशीनरी में घुस कर गंभीर नुकसान पहुचा सकते हैं।
इसलिए रिस्क ना लेते हुए 1972 में नासा ने स्पेस में अल्कोहल को बैन कर दिया !!!

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LIFE IN THE UNIVERSE

3: NO BREADS
जी हाँ... कोई भी खाना जिसके "चूर चूर हुए कण" बाहर फैलने की आशंका हो... ISS पर बैन है
इसलिए अस्ट्रॉनॉट्स के भोजन भली प्रकार से "डिहाईड्रेटेड" और गाय तथा सुवर की चर्बी से बने "जिलेटिन" में कोटेड होते हैं।
वही जिलेटिन... जिससे आज कल दवाइयो के कैप्सूल कवर बनाये जाते हैं। 
.
4: NO LAUNDRY 
पानी... स्पेस में सबसे बेशकीमती चीज है... जिसे कपडे धोने जैसी वाहियात चीज पर कोई नष्ट नही करना चाहता
इसलिये.. अस्ट्रॉनॉट्स... एक ही अंडरवियर, शर्ट, पैंट... महीनो तक पहने रहते हैं। 
चूँकि जीरो ग्रेविटी में हमारी "सूंघने" की क्षमता बहुत अधिक प्रभावित हो जाती है और ISS का वातावरण बहुत साफ़ तथा टेम्परेचर कण्ट्रोल है... इसलिए कपड़ो की "बदबू" अस्ट्रॉनॉट्स के लिए जल्द समस्या नही बनती
लेकिन चूँकि स्पेस में अपना bone mass मेन्टेन करने के लिए अस्ट्रॉनॉट्स को व्यायाम करना पड़ता है इसलिए पसीने से कपडे गंदे होते जाते है
जिन कपड़ो को अंत में.. अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की और फेंक देते हैं.. जहाँ वातावरण में एंट्री के दौरान हवा के घर्षण से ये कपडे जल के नष्ट हो जाते हैं।
एक प्रस्तावित आईडिया कपड़ो को ना फेंक कर... उन कपड़ो को "बैक्टीरिया" को फीड करने के लिए इस्तेमाल करना भी है
जो बैक्टीरिया "मीथेन" गैस का उत्पादन कर स्पेसक्राफ्ट के लिए ईंधन मुहैया कराने का साधन भी बन सकते हैं।
Who To Know... May Be Soon We Will Be Seeing "Underwear Powered Spacecraft"




;-)
.
तो अगली बार जब भी आप शराब पिए या नए कपडे पहने या अपनी गर्लफ्रेंड के साथ नाईट आउट का प्लान बनाये तो याद रखियेगा कि ब्रह्माण्ड में फिलहाल सिर्फ पृथ्वी ही एकमात्र जगह है... जहाँ आपको अपनी जिंदगी अपने मुताबिक जीने का पूरा हक़ है।
Drink Beer.. Have Sex... Eat Pizza... !!!
Enjoy This Privilege Of Freedom Being An Earthling !!!
(Of course Change Underwear Everyday Too)
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A Tunnel Through Earth - पृथ्वी के आर पार सुरंग का सफ़र कैसा होगा ?

अगर हम पृथ्वी के केंद्र से होते हुए एक सुरंग बनाये... जो सुरंग पृथ्वी के आर पार होती हो
और हम सुरंग में कूद जाए तो.. क्या होगा ?
सबसे पहली बात... ये आपके लिए एक अच्छा अनुभव साबित नही होने वाला है
ऑफ़कोर्स पृथ्वी का केंद्र जहाँ तापमान लगभग सूर्य की सतह के बराबर और प्रेशर "30 लाख गाडियो" को सर पे उठाने के बराबर है... वहां किसी इंसान के जीवित रहने की कल्पना नही की जा सकती
इतना अधिक प्रेशर आपके फेफड़े को collapse कर देगा और तापमान आपके शरीर को मूलभूत कणो में विखंडित कर देगा

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Why It's Harder To Dig Downwards - क्या पृथ्वी के केंद्र तक खुदाई करना संभव है?

फिर भी.. As A Thought Experiment... Lets Ignore Temperature & Pressure..
मान लीजिये हम ये सुरंग बना लेते है
और... दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री युगपुरुष जी को इसमें धक्का दे देते है तो क्या होगा?
सबसे पहली बात.. सुरंग का ये सफ़र... बहुत "छिलाऊ" अनुभव होगा?
चूँकि पृथ्वी लगातार अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूम रही है (Including You)
तो जब युगपुरुष जी इस सुरंग में छलांग लगायेगे.. तो गिरते वक़्त भी उनका शरीर पश्चिम से पूर्व की ओर गतिमान रहेगा
पर चूँकि पृथ्वी की निचली सतहें... ऊपरी सतह के मुकाबले धीमी गति से घूमती है
इस कारण... गिरते वक़्त युगपुरुष जी... सुरंग की दीवारो से रगड़ खाते हुए नीचे गिरेंगे... जो कि खाल छील देने वाला अनुभव होगा
अगर आप एक आम आदमी को ये कष्ट नही देना चाहते तो... ये सुरंग "उत्तरी ध्रुव" से शुरू कर... दक्षिणी ध्रुव पर निकालना सबसे बेहतर उपाय रहेगा
क्यों? क्योंकि ध्रुवो पर पृथ्वी का रोटेशन शुन्य है।



तो नार्थ पोल से बनाई जब इस सुरंग में युगपुरुष जी गिरेंगे तो सबसे इम्पोर्टेन्ट फैक्टर होगा... Air Friction !!!
जब भी हम कोई गेंद फेंकते है तो गेंद हवा के अणुओ से टकरा कर घर्षण के कारण अपना वेग खो के रुक जाती है
उसी प्रकार... अगर सुरंग में हवा होगी तो युगपुरुष जी एक अधिकतम वेग प्राप्त करने के बाद जैसे जैसे केंद्र की तरफ बढ़ेंगे.. वैसे वैसे उनकी गति शुन्य होती जायेगी
केंद्र पर पहुच कर... चूँकि वो ऐसी स्थिति में होंगे.. जहाँ उनके चारो तरफ बराबर मात्रा में मौजूद पृथ्वी का द्रव्यमान उन्हें अपनी तरफ खींच रहा होगा
इसलिए केंद्र में जाके युगपुरुष जी हवा में भारहीन होके त्रिशंकु की तरह हमेशा के लिए स्थिर हो जायेगे।




पर अगर मान लिया जाए कि अगर हम इस सुरंग में किसी तरफ Air Friction Free Vacuum मेन्टेन कर पाते है तो स्थिति कुछ और होगी
.... वैक्यूम टनल में... युगपुरुष जी का वेग केंद्र तक पहुचते पहुचते 29000 km/hour हो चुका होगा
और... युगपुरुष जी इस वेग के साथ... केंद्र को सनसनाती गोली की तरह पार कर जायेगे
लेकिन... जैसे ही केंद्र को पार करके... युगपुरुष जी... दक्षिणी ध्रुव की तरफ बढ़ेंगे
वैसे वैसे... पृथ्वी की ग्रेविटी के कारण उनकी स्पीड कम होनी शुरू हो जायेगी
दक्षिणी ध्रुव स्थित सुरंग के छोर तक पहुचते पहुचते.. जीरो हो चुकी स्पीड के साथ... युगपुरुष जी सुरंग के दूसरे सिरे से निकल कर हवा में दो चार मीटर ऊपर तक निकल जायेगे
और
अगर उन्हें दूसरे छोर पर खड़े किसी मनुष्य ने अगर "कैच" नही कर लिया तो...
तो.. युगपुरुष जी वापस सुरंग में गिर जायेगे और उनका सफ़र दोबारा चालु हो जाएगा
और ऊपर लिखी प्रक्रिया दोहराई जायेगी
और अनंत काल तक युगपुरुष जी.. "नार्थ पोल से गिरे, साउथ पोल पे निकले" तथा... "साउथ पोल से गिरे, नार्थ पोल पे निकले" वाली क्रिया दोहराते रहेगे !!!
.
कहानी खत्म... पैसा हजम !!!
Well... कहीं आप युगपुरुष जी को कैच करने की तो नही सोच रहे?
Are You Serious??? ;-)
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Why It's Harder To Dig Downwards - क्या पृथ्वी के केंद्र तक खुदाई करना संभव है?

जमीन की छाती चीर कर खनिज पदार्थ निकालना प्राचीन काल से ही मानव का पसंदीदा शगल रहा है। प्राचीन कथाओ में पृथ्वी की खुदाई के अनेको वर्णन मिलते हैं। 
खुदाई करते वक़्त एक चीज ऐसी थी... जो उस वक़्त इंसान की समझ से परे थी
और वो ये कि... जैसे जैसे हम पृथ्वी की खुदाई करते हुए... पृथ्वी के गर्भ की ओर बढ़ते हैं
वैसे वैसे... गर्मी असहनीय रूप से क्यों बढ़ती जाती है?
.
1824 को जन्मे प्रसिद्ध वैज्ञानिक "लार्ड केल्विन" ने सुझाया था कि... पृथ्वी जन्म से ही गर्म रही होगी
लार्ड केल्विन के अनुसार.. चूँकि एक आलू को भून कर कुछ देर रख देने पर आलू की बाहरी परते ठण्डी हो जाती है लेकिन अगर आलू को चीर कर देखा जाए तो... आलू की अंदरुनी सतह गर्म ही मिलेगी
इस Analogy के आधार पर लार्ड केल्विन ने ये भी सुझाया कि पृथ्वी का अंदरुनी तापमान और समय के साथ तापमान में आने वाले अंतर को ज्ञात करके... पृथ्वी की मौजूदा आयु भी ज्ञात की जा सकती है
सन 1890 में किये अपने प्रसिद्ध प्रयोगों के बाद लार्ड केल्विन ने पृथ्वी की आयु... दो करोड़ साल आंकी थी !!!

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Lord Kelvin... Was Badly Mistaken !!!


लार्ड केल्विन के तापमान संबंधी गलत निष्कर्षो का मुख्य कारण.. तत्काल विश्व को "रेडियोएक्टिविटी" नामक चीज की जानकारी ना होना थी
आज हम जानते हैं कि पृथ्वी की अंदरुनी सतह यानी केंद्र में रेडियोएक्टिव एलिमेंट्स का निरन्तर क्षय होता रहता है... जिस कारण पृथ्वी का केंद्र लगभग 5000 डिग्री यानी सूर्य की सतह के समान गर्म रहता है।
None The Less.. Earth Is Not A Baked Potato !!!
.
लार्ड केल्विन बेशक गलत हो लेकिन उस युग में... जब पृथ्वी की उम्र 6000 साल मानी जाती रही हो
तब... पृथ्वी की उम्र करोडो साल में आंकने का दुस्साहस भी... कम साहसिक कार्य नही कहा जा सकता 
.
चूँकि पृथ्वी की कोर अभूतपूर्व रूप से बहुत गर्म है... इस कारण पृथ्वी के केंद्र से ऊष्मा ऊपर की ओर प्रवाहित होती रहती है। यही कारण है कि ज्यो ज्यो हम पृथ्वी के केंद्र की ओर जाते है... त्यों त्यों गर्मी असहनीय रूप से बढ़ती रहती है... क्योंकि आप लगातार गर्मी के स्त्रोत की तरफ बढ़ रहे होते हैं।
पृथ्वी के केंद्र की ओर जाने पर... आपको पिघली हुए चट्टानों के लावा के समुद्र को भी पार करना पड़ता है
आप कितनी भी कोशिश करके कोई सुरंग बना लें.. लेकिन अगले ही पिघली हुई चट्टाने... साइड से बह कर उस सुरंग को भर देगी !!!



इसके साथ साथ
पृथ्वी के केंद्र में.. आपके चारो तरफ समूची पृथ्वी का भार होगा... जिसका आपके शरीर पर प्रेशर... हर इंच पर अरबो किलोग्राम होगा
प्रचण्ड तापमान और प्रेशर की उन विषम परिस्थितियों में किसी मानव के जीवित रह पाने की उम्मीद नही की जा सकती
यही कारण है कि.. 20 साल लगातार खुदाई करने के अथक प्रयासों के बावजूद... इंसान कभी भी पृथ्वी के अंदर 12 किलोमीटर से अधिक नही खोद पाया है।
.
लेकिन एक मिनट... जब हम कभी पृथ्वी के केंद्र तक नहीं पहुच पाये है तो हम कैसे जानते है कि पृथ्वी के केंद्र में क्या है?
How Do We Know Anything About Earth's Interior??
Well... हम पृथ्वी के केंद्र के बारे में उसी प्रकार जानते है... जिस प्रकार बिना सूर्य पर गए हम ये जानते हैं कि... सूर्य क्या है !
Waves Analysis !!!
सीस्मोग्राफ जैसे यंत्रो की सहायता से वैज्ञानिक... पृथ्वी के अंदर से भूकंप आदि के वक़्त आने वाली एनर्जी वेव्स का परिक्षण करते हैं
ये एनर्जी वेव्स... अलग अलग मटेरियल से गुजरते वक़्त... अलग अलग Patterns Signature देती है
इस प्रकार हम इनकी प्रॉपर्टीज का अध्ययन कर जान जाते है.. कि ये वेव्स... किन किन पदार्थो से गुजर कर आई हैं !!
प्लस... सर आइजक न्यूटन की समीकरणों के बल पर हम पृथ्वी का द्रव्यमान और साइज़ जानते है.. इस तरह हम पृथ्वी का औसत घनत्व भी निकाल सकते हैं
और हमारी कैलकुलेशन ये बताती है कि... पृथ्वी का औसत घनत्व... सतह की चट्टानों से दुगना है




अर्थात...
सतह की चट्टानों से भी कई गुणा ठोस पदार्थ... पृथ्वी के अंदर मौजूद है !!!
और ये पदार्थ.. सिर्फ "Metal" हो सकते हैं... जिसकी पुष्टि सीस्मोग्राफ भी करता है
प्लस... पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड हम साफ़ तौर पर देख सकते हैं
और एक ग्रह विशाल चुम्बक की तरह तभी कार्य करता है... जब... उस ग्रह के केंद्र में एक विशाल लौह चुम्बक मौजूद हो !!
अगर पृथ्वी के केंद्र में लौह चुम्बक अथवा आयरन Charged Particles नही होते तो सूर्य के घातक रेडिएशन से हमारी रक्षा करने वाली मैग्नेटिक फील्ड सम्भव ही नही होती
कुछ ही पलो में सूर्य की घातक किरणे पृथ्वी पर मौजूद सभी मानवो को भून कर कबाब बना देती
None The Less... पृथ्वी पर जीवन कभी सम्भव नही हो पाता !!!
.
But Anyways... Ignore Temperature Pressure 
अगर मान लेते है कि... किसी प्रकार आप तापमान और प्रेशर की विषम परिस्थितियों को दरकिनार कर किसी प्रकार पृथ्वी के आर पार एक सुरंग बना लेते हैं
तो क्या होगा... अगर कोई इसमें छलांग लगा दे?
कैसा होगा... पृथ्वी के आरपार सुरंग का सफर?
जानिये अगली पोस्ट में...
To Be Continued
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